वंधामा हिंदू नरसंहार: महिलाओं और बच्चों सहित 23 हिंदुओं के टुकड़े टुकड़े कर डाले गए

वंधामा हिंदू नरसंहार: महिलाओं और बच्चों सहित 23 हिंदुओं के टुकड़े टुकड़े कर डाले गए

आजादी के बाद से जम्मू कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की स्थिति रही है। दोनो देश इस राज्य पर अपना अपना दावा पेश करते रहे हैं। इसे लेकर दोनो देशों में कई युद्ध लड़े जा चुके हैं जिनमे हर बार भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह हराया।

जब पाकिस्तान को ये समझ आ गया कि वह सैन्य ताकत के दम पर भारत से जम्मू कश्मीर को हासिल नहीं कर सकता तो उसने छद्म युद्ध का खतरनाक खेल रचा। इसके साथ ही शुरू हुआ जम्मू कश्मीर में आतंक का खतरनाक खेल, जिसके दुष्परिणाम सबसे ज्यादा वहां के हिंदुओं को भुगतने पड़े।

पाकिस्तान द्वारा पाले गए इस्लामी आतंकियों ने कश्मीर में हिंदुओं का जमकर खून बहाया और अनेकों हिंदू नरसंहारों को अंजाम दिया। कश्मीर घाटी तो लगभग हिंदुओं से मुक्त कर दी गई। कभी हिंदू मंदिरों से गुलजार रहने वाली कश्मीर घाटी में आज गिने चुने ही हिंदू बचे हैं और वे भी आज खौफ के साए में जी रहे हैं।

पाकिस्तान पोषित इस्लामी आतंकियों द्वारा कश्मीर में अंजाम दिए गए अनेको नरसंहारों में ही एक है वंधामा का नरसंहार। वंधामा गांव जो कि कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से 28 किलोमीटर दूर है, कभी हिंदू बहुल हुआ करता था। लेकिन एक दिन पाकिस्तानी इस्लामी आतंकियों ने यहां हिंदुओं के भयानक नरसंहार को अंजाम दिया। पूरा का पूरा गांव एक ही रात में हिंदुओं से मुक्त कर दिया गया।

बूढ़े, बच्चे और यहां तक कि महिलाओं को आतंकियों ने मौत के घाट उतार दिया और ना केवल उन्हें मारा बल्कि आसपास के गांवों के हिंदुओं में खौफ भरने के लिए उनके शरीरों के टुकड़े टुकड़े कर डाले। आतंकियों की इस क्रूरता से पता चलता है कि उनके मन में हिंदुओं के लिए कितनी घृणा रही होगी।

क्या हुआ था वंधामा में?

वंधामा गांव कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से 28 किलोमीटर दूर है। 1998 में जब देश में अटल बिहारी वाजपेई की सरकार थी, यह गांव हिंदू बहुल हुआ करता था। यहां के अधिकांश निवासी हिंदू पंडित थे।

हालांकि कश्मीर में इस्लामी आतंकियों ने पंडितों पर 1990 से ही जुल्म ढा रखे थे, लेकिन फिर भी कुछ गांवों में पंडित बचे हुए थे। वंधामा भी इसी तरह का एक गांव था।

25 जनवरी 1998 की रात को इस्लामी आतंकियों ने इन बचे हुए हिंदू पंडितो के मन में डर पैदा करने और उन्हें कश्मीर से निकलने को मजबूर करने के लिए वंधामा गांव में इस दुर्दांत नरसंहार को अंजाम दिया।

उस रात को अचानक अनेकों इस्लामी आतंकियों ने ऑटोमैटिक हथियारों से लैस होकर गांव पर धावा बोल दिया। इस समय सभी गांववासी गहरी नींद में थे।

इससे पहले की कोई समझ पाता गांव के सारे हिंदुओं को मारा जा चुका था। उन्हें इतनी बेरहमी से मारा गया था कि कइयों के शरीर के तो टुकड़े टुकड़े कर डाले गए थे। इसके अलावा हिंदुओं के घरों को भी आग के हवाले कर डाला गया था। यहां तक कि गांव में स्थित एक मंदिर तक को फूंक दिया गया।

मृतकों के क्षत विक्षत शरीरों को देखकर यह स्पष्ट था कि आतंकियों के मन में हिंदुओं के प्रति कितनी घृणा भरी हुई थी। साफ था कि ये कोई आम हत्याकांड नहीं था, बल्कि ऐसा जानबूझकर हिंदुओं में डर पैदा करने के लिए किया गया था।

वंधामा में मारे गए 23 हिंदुओं में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। जबकि हमलावरों की संख्या 50 से ज्यादा थी। जम्मू कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला और गृह मंत्री अली मोहम्मद ने भी यह कबूल किया था कि हिंदुओं को बेरहमी से काट डाला गया था।

अमेरिका तक में हुई थी वंधामा नरसंहार की चर्चा

वंधामा के इस नरसंहार की चर्चा पूरी दुनिया में हुई थी। यहां तक कि अमेरिका ने भी इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया और इसे हिंदुओं के खिलाफ एक नरसंहार कहा।

लेकिन विडंबना ये है कि कश्मीरी नेता इसे हिंदू नरसंहार कहने से बचते रहे। जम्मू कश्मीर डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी के संस्थापक शाबिर शाह इसे कायराना हरकत तो बताया, लेकिन इस्लामी आतंकियों का नाम तक नहीं लिया।

वहीं अब्दुल गनी लोन ने इस नरसंहार के बावजूद बड़ी बेशर्मी से खुद को और कश्मीरी मुस्लिम समुदाय को पीड़ित दिखाने की कोशिश की।

भारत गणराज्य को चुनौती थी वंधामा नरसंहार

वंधामा में हुआ हिंदुओं का यह भीषण नरसंहार दरअसल पूरे भारतीय गणराज्य को एक चुनौती दी गई थी। आतंकियों ने भारत के गणतंत्र दिवस के विरोध में उस समय बंद बुलाया हुआ था। यह घटना भारत के गणतंत्र दिवस से मात्र एक दिन पहले अंजाम दी गई।

आतंकी कुछ हद तक अपने इस मकसद में कामयाब भी रहे। क्योंकि आज तक इस नरसंहार के आरोपियों को पकड़ा नहीं जा सका है। वहीं भारत की सरकारों का भी इसके प्रति ढुलमुल सा रवैया ही रहा।

वहीं कश्मीर के स्थानीय नेताओं ने इसका प्रयोग अपनी राजनीति चमकाने में किया और पीड़ितों को न्याय दिलाने की कोई चेष्टा नहीं की गई।

पूरे गांव में सिर्फ एक हिंदू लड़का जिंदा बचा

इस दुर्दांत नरसंहार की घटना में वंधामा गांव में सिर्फ एक हिंदू लड़का ही जीवित बच पाया था, जिसकी उम्र उस समय 12 वर्ष थी। विनोद नाम के इस लड़के ने अपने बयान में बताया कि आतंकियों ने पहले लोगों से चाय की मांग की और बाद में अचानक गोलीबारी शुरू कर दी। जबकि वह गोलीबारी के समय गोबर के एक ढेर के नीचे छुप गया था।

इस गोलीबारी में विनोद का परिवार और उसके पड़ोसियों की तुरंत मौत हो गई। मारे गए 23 लोगों में 10 महिलाएं, 9 पुरुष और 4 बच्चे थे। ये सभी कश्मीरी पंडित थे।

केंद्र सरकार ने भी इस नरसंहार को एक तरह से भुला दिया

तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेई की सरकार और उसके बाद दस साल तक सत्ता में रही यूपीए सरकार ने एक तरह से इस मामले से पल्ला झाड़ लिया था।

इस घटना की जांच और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए किसी तरह की कोई कोशिश केंद्र सरकार की तरफ से नहीं की गई। वहीं राज्य सरकार ने भी इस मामले की फाइल बंद कर दी। राज्य सरकार ने इसके पीछे आतंकियों की पहचान नहीं हो पाने का तर्क दिया।

दूसरी ओर, एक आरटीआई के जवाब में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा था कि उसके पास इस नरसंहार में शामिल आतंकियों या आतंकी संगठनों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।