बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार किसी से ढके छुपे नहीं हैं। 1971 से पहले जब यह पाकिस्तान का हिस्सा हुआ करता था तो पाकिस्तानी एजेंसियां हिंदुओं को भारत का जासूस बताकर उन पर जुल्म ढाती थी। वहीं 1971 में भारत की मदद से आजादी पाने के बाद भी हिंदुओं की दशा में कोई सुधार नहीं आया।
वर्षों से बांग्लादेश में हिंदू इस्लामिक कट्टरपंथियों के जुल्म का शिकार होते आ रहे हैं। शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या और देश में मार्शल लॉ लगाए जाने के बाद से बांग्लादेश में हिंदुओं की हालत और ज्यादा बदतर होती चली गई।
बांग्लादेशी हिंदुओं की दुर्दशा और उन पर हो रहे अत्याचारों का ऐसा ही एक उदाहरण है बंशखली हत्याकांड। बल्कि इसे हत्याकांड की जगह अगर नरसंहार कहा जाए तो ज्यादा बेहतर होगा, क्योंकि जिस दुर्दांत और बर्बर तरीके से बंशखली में एक हिंदू परिवार के 11 लोगों को मारा गया था उसे सिर्फ एक हत्याकांड की संज्ञा देना उचित नहीं होगा।
क्या हुआ था बंशखली में?
यह घटना 2003 की है, जब बांग्लादेश के चटगांव के उपजिले बंशखली में एक हिंदू परिवार के 11 लोगों को जिंदा जलाकर मार डाला गया था। इस्लामिक कट्टरपंथियों के इस हमले में बांग्लादेशी हिंदू तेजेंद्र लाल शील के घर में बारूद का प्रयोग करते हुए आग लगा दी गई थी। इस हमले में परिवार के 11 लोग जिनमें 72 साल के बुजुर्ग से लेकर 4 दिन का बच्चा तक शामिल था, जलकर मर गए।
बंशखली नरसंहार में मरने वालों में 70 साल के तेजेंद्र लाल शील, उनकी 60 साल की पत्नी बकुल शील, बेटा अनिल शील (40) और उसकी पत्नी स्मृति शील (32), स्मृति के तीन बच्चे रूमी (12), सोनिया (7) और 4 दिन का बच्चा कार्तिक शामिल थे। इनके अलावा तेजेंद्र की भतीजियां बबूती शील, प्रसादी शील और एनी शील भी इस नरसंहार का शिकार हो गई थी। वहीं एक अन्य परिजन 72 साल के देवेंद्र शील जिंदा जल जाने के कारण मारे गए।

इस नरसंहार में शील परिवार के सिर्फ एक सदस्य बिमल शील ही बच पाए थे जो हमले के वक्त घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे। बिमल आज तक अपने परिवार को न्याय दिलाने के लिए दर दर की ठोकरें खा रहे हैं।
बिमल ने बताया कि अवामी लीग के नेताओं ने उन्हें न्याय दिलाने का भरोसा दिया था, हालांकि बाद में सभी ने इस मामले को जैसे भुला दिया। यही नहीं, उनकी सुरक्षा के लिए स्थापित किए पुलिस कैंप को भी हटा दिया गया है, जिससे उनकी जान को भी खतरा है।
डर का माहौल ऐसा कि कोर्ट में गवाही तक नहीं हो पाई
बिमल बताते हैं कि गवाहों में भी कट्टरपंथियों का डर बैठा हुआ है। हालत ये है कि कोई भी चश्मदीद गवाह कोर्ट जाकर गवाही देने को तैयार नहीं होता। यहां तक कि बंशखली थाने के तत्कालीन ओसी और मामले की जांच करने वाले एएसपी ने भी गवाही नही दी है।
हालांकि जून 2019 में दिए एक फैसले में स्थानीय हाईकोर्ट ने इस मामले को 6 महीने में खत्म करने का आदेश दिया था। लेकिन उस आदेश के बाद भी मामले में कोई तेजी भी देखी गई, ना ही किसी गवाह के बयान दर्ज हो पाए।
बिमल के अनुसार इस मामले में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेता भी शामिल थे। संभवतः यही कारण है कि इस मामले में न्याय मिलने में देरी हो रही है।
