1500 की भीड़ ने जला दिया था मंदिर और स्वामी अद्वैतानन्द की समाधि – 2020 का करख मंदिर हमला

1500 की भीड़ ने जला दिया था मंदिर और स्वामी अद्वैतानन्द की समाधि – 2020 का करख मंदिर हमला

पाकिस्तान में हिंदुओं की स्थिति किसी से ढकी छुपी नहीं हैं। पाकिस्तान के अलग अलग हिस्सों में अल्पसंख्यक हिंदुओं और उनके मंदिरों पर हमले होते रहते हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान में हिन्दू समुदाय लगातार सिकुड़ता जा रहा है। कट्टरपंथियों के दबाव और प्रशासन में उनका सीधा हस्तक्षेप होने के कारण भी हिंदुओं की स्थिति पाकिस्तान में खराब है।

आज की कड़ी में हम ऐसे ही एक हमले की बात करेंगे जिसमें खैबर पख्तूनख्वा के करख जिले में स्थित एक ऐतिहासिक हिन्दू मंदिर को इस्लामिक कट्टरपंथियों की भीड़ द्वारा जला दिया गया था।

2020 का कृष्णद्वारा मंदिर हमला

कृष्णद्वारा मंदिर पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में करख जिले के टेरी क्षेत्र में स्थित है। मंदिर की स्थापना साल 1919 में की गई थी जब अद्वैत मत के स्वामी अद्वैतानन्द परमहंस जी का देहांत हुआ और उनकी समाधि यहाँ बनाई गई। यह मंदिर 1947 तक अच्छी हालत में था, लेकिन विभाजन के बाद इलाके का हिन्दू समुदाय यहाँ से पलायन कर गया। इसके बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों ने मंदिर को बंद कर दिया।1997 में मंदिर की जमीन पर कब्जे के लिए मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा इसे गिराने की भी कोशिश की गई थी। हालांकि तब पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के कारण इसे बचा लिया गया। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया। कोर्ट ने मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए कुछ जमीन भी समिति को दी थी, जिस पर स्थानीय मुस्लिम कट्टरपंथियों ने सवाल उठाए थे।

बाद में स्थानीय हिन्दू और मुस्लिम समुदाय में मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर एक समझौता हो गया जिसके तहत मंदिर समिति एक निश्चित क्षेत्र से आगे निर्माण नहीं करने के लिए सहमत हो गई थी। दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय ने भी मंदिर निर्माण में सहयोग देने और किसी भी तरह की समस्या खड़ी नहीं करने पर सहमति जताई थी।

जमीयत उलेमा ए इस्लाम पार्टी के समर्थकों ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के साथ मिलकर किया हमला

‘जमीयत उलेमा ए इस्लाम’ खैबर पख्तूनख्वा की एक क्षेत्रीय इस्लामिक कट्टरपंथी राजनीतिक पार्टी है। अपने राजनीतिक हित साधने और हिंदुओं से नफरत के चलते इस पार्टी के नेताओं ने स्थानीय कट्टरपंथी धर्मगुरुओं के साथ मिलकर लोगों को हिन्दू समुदाय और मंदिर निर्माण के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया।

इस पार्टी के नेताओं ने स्थानीय लोगों को भड़काया कि हिन्दू समुदाय मंदिर निर्माण में समझौते का उल्लंघन कर रहा है। पार्टी ने आरोप लगाया कि मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए समिति निश्चित क्षेत्र से आगे निर्माण करने का प्रयास कर रही है। जबकि उक्त जमीन पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही हिन्दू समुदाय को आवंटित की गई थी। पार्टी के नेताओं ने इस जमीन पर मुसलमानों का हक बताया और उन्हें मंदिर के जीर्णोद्धार को बाधित करने के लिए उकसाया।

इसके बाद 30 दिसम्बर 2020 को इस्लामिक कट्टरपंथी मुल्लाओं और जमेयत ए इस्लाम पार्टी के नेताओं के नेतृत्व में भीड़ में मंदिर पर हमला कर दिया। इस हमले में मंदिर को जमकर नुकसान पहुंचाया गया और मंदिर परिसर को आग के हवाले कर दिया। हमलावरों ने स्वामी परमहंस अद्वैतानन्द की समाधि को भी आग के हवाले कर दिया।

हमलावरों ने मंदिर को आग लगते हुए वीडियो भी बनाया और उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट किया ताकि हिन्दू समुदाय में दहशत फैले और कोई विरोध की हिमाकत ना कर सके।

350 लोगों के खिलाफ FIR, 71 की गिरफ़्तारी लेकिन किसी ठोस कार्रवाई की सूचना नहीं

मंदिर पर हमले की खबरें बाहर आते ही भारत और अन्य देशों ने इसकी निंदा की। अपनी फजीहत होते देख पाकिस्तान की तत्कालीन इमरान खान सरकार ने तुरंत कार्रवाई करने का दिखावा किया। मामले में 350 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई, वहीं 26 लोगों को तुरंत तो 45 अन्य को बाद में गिरफ्तार किया गया। हालांकि इस मामले में किसी को सजा हुई या नहीं इसकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं हैं।

दूसरी ओर पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर मंदिर के जीर्णोद्धार का आदेश पारित किया। सुप्रीम कोर्ट ने पाकिस्तान सरकार को निर्देश दिए कि वह अपने खर्चे पर मंदिर का निर्माण करवाए। बाद में कोर्ट के इस आदेश पर भी विवाद खड़ा हो गया। इस्लामिक कट्टरपंथियों ने सरकारी पैसे से मंदिर निर्माण पर सवाल उठाए। मुल्ला-मौलवियों ने फतवे दिए कि एक इस्लामिक देश में सरकारी पैसे से गैर मजहब के धर्मस्थल का निर्माण नहीं करवाया जा सकता। यह शरीयत के खिलाफ है।