हिन्दी की एक बेहद प्रचलित कहावत है कि सच हमेशा वो नहीं होता जो दिखाई देता है। ये कहावत 1921 के मोपला नरसंहार पर बिल्कुल सटीक बैठती है। मोपला नरसंहार हिंदुओं के इतिहास का वो काला अध्याय है जब बीस हजार से ज्यादा हिंदुओं को काट डाला गया। चार हजार से ज्यादा हिन्दू स्त्रियों का बलात्कार किया गया और हजारों बच्चों को कुओं में डाल कर मार दिया गया।हालांकि हिंदुओं पर अत्याचार सिर्फ यहीं खत्म नहीं हो जाता। मेरा मानना है कि किसी को मार डालने से ज्यादा बर्बर है उस पर हुए अत्याचार की कहानी को मार डालना। केरल के मालाबार में हुए जिस मोपला नरसंहार की मैं बात कर रहा हूँ, उसकी कहानी को भी हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने मार डाला।
हिंदुओं के लिए सबसे ज्यादा दर्द की बात यही है कि उन्होंने ना केवल नरसंहार झेला बल्कि धूर्त इतिहासकारों द्वारा ऐसी परिस्थितियाँ बना दी गई कि हिन्दू अपने दर्द के बारे में बात भी नहीं कर सकता। इन धूर्त वामपंथी इतिहासकारों ने अपनी किताबों में मालाबार के हिन्दू नरसंहार को ना केवल स्वतंत्रता आंदोलन बना कर पेश किया बल्कि इसमें शामिल दंगाइयों को स्वतंत्रता सेनानी बना डाला।
मोपला हिन्दू नरसंहार 1921 में घटी वो घटना थी जिसमें निर्दयता से हजारों हिन्दू महिला, पुरुष और बच्चों को मार डाला गया। महिलाओं का बलात्कार किया गया और बड़े पैमाने पर हिंदुओं को इस्लाम में परिवर्तित करवा दिया गया था।
मोपला कौन थे और उनकी हिंदुओं से क्या दुश्मनी थी
मोपला दक्षिण एशिया में बसे शुरुआती मुसलमान थे और ये केरल के मालाबार क्षेत्र में रहते थे। मसालों के व्यापार के माध्यम से इन मोपला लोगों का अरब से सीधा संबंध था।
जिस समय हिंदुओं का नरसंहार हुआ तब मालाबार में मोपलाओं की जनसंख्या लगभग 35 प्रतिशत थी और ये उस समय क्षेत्र का सबसे बड़ा समुदाय था। साथ ही मसालों के व्यापार में मोपलाओं का लगभग एकाधिकार हुआ करता था।
हालांकि यूरोपीय ताकतों के आगमन के बाद मसाला व्यापार में मोपलाओं का एकाधिकार खत्म होने लगा और मोपलाओं का क्षेत्र में दबदबा भी घटने लगा। इससे मोपलाओं के मन में स्थानीय हिंदुओं के लिए घृणा और दुश्मनी बढ़ने लगी।
खिलाफत आंदोलन और मोपला विद्रोह
वामपंथी इतिहासकारों की कितबे बताती हैं कि खिलाफत आंदोलन वो आंदोलन था जिसमें हिंदुओं और मुसलमानों ने कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया। हालांकि खिलाफत शब्द का अर्थ ही है ‘खलीफा का राज’, तो जाहिर है ये आंदोलन अंग्रेजों के विरुद्ध तो था लेकिन इसका भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से कोई लेना देना नहीं था।
दरअसल इस आंदोलन के माध्यम से मुसलमान ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालना चाहते थे ताकि तुर्की में खलीफा के पद की पुनः स्थापना की जा सके। खलीफा को उस समय पूरी दुनिया में मुसलमानों का नेता माना जाता था। अंग्रेजों ने तुर्की के खिलाफ युद्ध को जीतकर इस पद को खत्म कर दिया था और खलीफा के अंतर्गत आने वाली उस्मानिया सल्तनत को भी समाप्त कर दिया।
इससे पूरी दुनिया के मुसलमान अंग्रेजों से चिढ़े हुए थे और दुनियाभर में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अभियान चला रहे थे।
भारत में भी मोहम्मद अली जौहर और मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे मुस्लिम नेताओं द्वारा इस तरह के आंदोलन का नेतृत्व किया जा रहा था, जिसे मोहनदास करमचंद गांधी का भी समर्थन प्राप्त था।
गांधी का मानना था कि खिलाफत आंदोलन के समर्थन से मुसलमानों में ब्रिटिश सरकार विरोधी भावना मजबूत होगी। उन्होंने शौकत अली के साथ कालीकट में हुए एक विशाल सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि “सभी हिन्दुओं का कर्तव्य है कि वह अपने मुस्लिम भाइयों के इस आंदोलन में सहयोग करें।” उनके इस भाषण ने खिलाफत आन्दोलन को काफी गति प्रदान की थी।
हालांकि एनी बेसेंट और डॉ भीमराव अंबेडकर जैसे नेता ना केवल आंदोलन की नैतिकता पर संदेह जता रहे थे बल्कि गांधी के इसे समर्थन देने की भी खासी आलोचना कर रहे थे।
डॉ अंबेडकर अपनी पुस्तक “पाकिस्तान या भारत का विभाजन” के पृष्ठ संख्या 146-47 पर लिखते हैं –
“(खिलाफत) आंदोलन मुसलमानों द्वारा शुरू किया गया था। जिसे गाँधी द्वारा दृढ़ता और विश्वास के साथ अपना लिया गया। इसने शायद कई मुसलमानों को आश्चर्यचकित कर दिया होगा। ऐसे कई लोग थे जिन्होंने खिलाफत आंदोलन के नैतिक आधार पर संदेह किया और गाँधी को आंदोलन में भाग लेने से रोकने की कोशिश की, जिसका नैतिक आधार इतना संदिग्ध था।”
मोपला नरसंहार की शुरुआत कैसे हुई?
अली मुसलियार मालाबार के प्रमुख खिलाफत नेताओं में से एक था जिसने क्षेत्र में इस अभियान का नेतृत्व किया। वह कट्टर इस्लामी व्यक्ति था, जिसने उस्मानिया सल्तनत के समाप्त होने के बाद अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया।
इस विद्रोह के लिए अली मुसलियार ने बहुत से कट्टर इस्लामी लोगों की स्वयंसेवकों के रूप में भर्तियाँ की। इन भर्तियों के लिए पहली शर्त होती थी कुरान पर हाथ रखकर शपथ लेना कि खिलाफत शासन की स्थापना के लिए हम मरने या मारने के लिए हमेशा तैयार रहेंगे।
इसके बाद अली मुसलियार ने अपने स्वयंसेवकों के साथ मिलकर ब्रिटिश प्रतिष्ठानों पर हमला करना शुरू कर दिया और पुलिस थानों जैसी जगहों पर अधिकार जमा लिया। उसने और अन्य खिलाफत नेताओं ने अधिकांश राज्यों को खिलाफत राज्य घोषित कर दिया और खुद को खलीफा के रूप में पेश किया।
लेकिन ब्रिटिशों को हराने के बाद भी ये विद्रोह खत्म नहीं हुआ बल्कि मोपला नरसंहार के रूप में उग्र होकर सामने आया। दरअसल वर्षों से जो घृणा हिंदुओं के लिए मोपलाओं के मन में बढ़ रही थी अब उसे सामने लाने का समय आ गया था।
मोपलाओं ने हिन्दू बस्तियों पर हमला करना शुरू कर दिया। हिंदु पुरुषों को मार डाला गया और उनकी स्त्रियों के साथ जघन्य तरीके बलात्कार किये गए। हिंदुओं के छोटे बच्चों को जिंदा ही कुओं में डाल दिया गया। ऐसा कहा जाता है कि उस समय मालाबार के कुओं में पानी नहीं बल्कि हिंदुओं के बच्चों की लाशें, उनके कटे सर, अंग, मृत शरीर मिलते थे।
खिलाफत के नाम पर इस कट्टर इस्लामिक मोपलाओं ने बीस हजार से ज्यादा हिंदुओं का कत्लेआम किया। हजारों हिन्दू महिलाओं का बलात्कार किया गया, उन्हें जबरन इस्लाम में धर्मांतरित करवाया गया। एक हजार से ज्यादा प्राचीन और भव्य मंदिरों को तोड़ डाला गया। इसके अलावा दो लाख से ज्यादा लोगों को अपना घर-व्यापार छोड़ कर विस्थापित होना पड़ा।
कहते हैं कि मालाबार के हालात इतने भयानक हो गए थे कि ब्रिटिश अधिकारी भी सन्न रह गए। अंततः ब्रिटीशर्स ने स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए मालाबार में मार्शल लॉ लागू कर दिया।
हिंदुओं के लिए त्रासदी का अंत नहीं
मोपला नरसंहार कहने को तो आज से लगभग सौ साल पहले अंजाम दिया गया था, लेकिन हिंदुओं के लिए त्रासदी का अंत यहीं नहीं हो जाता। अपने हजारों सहधर्मियों के मारे जाने और विरासत के नष्ट हो जाने के बावजूद वामपंथी इतिहासकारों और नेताओं ने इसके लिए हिंदुओं को ही दोषी ठहराने की पूरी कोशिश की।
आज भी इस घटना को ना केवल नरसंहार मानने से इनकार किया जाता है बल्कि इसके बारे में बात करने वालों को सांप्रदायिक घोषित करके नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है।
यह स्पष्ट है कि इस घटना का एकमात्र लक्ष्य इस्लामिक राज स्थापित करना था, जिसकी प्राप्ति के लिए अभूतपूर्व हिंसक गतिविधियां की गई। लेकिन उस समय का राष्ट्रीय नेतृत्व मुकदर्शक बना रहा और इसे एक कृषि विद्रोह के रूप में परिभाषित करता रहा।
केरल में बाद की साम्यवादी सरकारों ने इतिहास के पुनरलेखन में इस नरसंहार को आजादी की लड़ाई घोषित कर दिया और इसमें शामिल दंगाइयों को स्वांतत्रता सेनानी।
इस कार्य में कम्युनिस्ट आंदोलन के अग्रणी नेता ईएमएस नंबूरीपाद भी शामिल रहे, जबकि उनके अपने परिवार को इस हिंसा के कारण पलायन करना पड़ा था। अपने शुरुआती दिनों के लेखन में उन्होंने मोपला दंगों को सांप्रदायिक बताया, लेकिन बाद में इससे मुकर गए और दंगों को कृषि संकट करार दिया। हालांकि 1973 में केंद्र सरकार ने संसद में कहा था कि मालाबार विद्रोह एक सांप्रदायिक दंगा था और इसे स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
