नवरात्रि और दुर्गापूजा पूरी दुनिया में हिंदुओं के लिए पवित्र त्योहार है। इस दौरान हिंदू 9 दिनों तक मां दुर्गा की पूजा करते हैं। हिंदुओं में भी बंगाली हिंदुओं के लिए यह त्योहार सबसे महत्वपूर्ण होता है।
इसलिए भारत के बंगाल और बांग्लादेश में हिंदू इस त्योहार को धूमधाम से मनाते हैं। लेकिन हम आपको बताने जा रहे हैं बंगाली हिंदुओं के सबसे प्रमुख त्योहार के दौरान उनके नरसंहार की कहानी।
दरअसल ये बात है अक्तूबर 2021 की। दुनियाभर के हिंदुओं की ही तरह बांग्लादेश के हिंदू भी दुर्गापूजा का त्योहार धूम धाम से मना रहे थे। इस दौरान मंदिरों और हिंदू इलाकों में मां दुर्गा के पांडाल सजाए गए थे और हिंदू अपने रीति रिवाजों से दुर्गा मां की पूजा कर रहे थे।
इस पूजा के दौरान ही हिंदुओं पर क्रूर हमलों की एक पूरी श्रृंखला को अंजाम दिया गया। वहीं बांग्लादेश की सरकार इस दौरान हिंदुओं को सुरक्षा देने की जगह हिंसा की घटनाओं को छुपाने का प्रयास करती रही। बांग्लादेशी मीडिया ने भी हिंदुओं के साथ हुई इस हिंसा को छुपाने का पूरा प्रयास किया और इस मुद्दे पर कोई खास रिपोर्टिंग नहीं दिखाई दी।
हालांकि सोशल मीडिया पर हिंदुओं के साथ हुई बर्बरता की तस्वीरें सामने आ गई जो आज भी इंटरनेट पर मौजूद है।
सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि हिंसा की ये कार्रवाई पुलिस की मौजूदगी और तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के बयानों के बाद भी जारी रही।
कैसे हुई हिंसा की शुरुआत?
दरअसल 13 अक्तूबर 2021 को एक फेसबुक पोस्ट वायरल हुआ जिसमें दावा किया गया था कि हिंदुओं ने दुर्गापूजा के दौरान कुरान का अपमान किया है। इस पोस्ट में दावा किया गया था कि दुर्गापूजा के दौरान कुरान की एक प्रति को मां दुर्गा की मूर्ति के पैरों में रखा गया।
यह फेसबुक पोस्ट वायरल होने के बाद से ही पूरे बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं सामने आने लगी और कट्टरपंथियों ने पूरे सिस्टम को अपाहिज बना दिया। इस दौरान एक सुनियोजित तरीके से हिंदुओं की हत्याएं की गई।
यहां तक लोगों ने इस घटना का इस्तेमाल अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी निकलने के लिए भी किया और चुन चुनकर हिंदुओं की मारा गया।
हालांकि बाद में पुलिस की जांच में ये सामने आया कि कुरान की जिस प्रति को दुर्गा पांडाल में रखे जाने से ये हिंसा भड़की थी, उसे इकबाल हुसैन नाम के एक व्यक्ति ने रखा था। ऐसे में ये साफ हो जाता है कि हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की ये घटनाएं पूर्वनियोजित थी और इसके लिए कट्टरपंथियों ने पहले से संसाधन जुटा रखे थे।
बाद में विशेषज्ञों ने भी यह स्पष्ट किया कि जिस स्तर की हिंसा को हिंदुओं के साथ अंजाम दिया गया वह सिर्फ एक अफवाह के कारण स्वतः स्फूर्त घटना नहीं हो सकती। इस तरह की हिंसा करने के लिए भीड़ को सशस्त्र पर पहले से तैयार रहना होता है।
दुकानें और घरों में आग लगा दी गई, मां दुर्गा की मूर्तियों के सर कलम कर दिए
हिंसा की इन घटनाओं के दौरान हिंदुओं और उनके मंदिरों को सबसे खराब तरीके से अपमानित किया गया। कई हिंदू मंदिरों और पूजा मंडपों को तोड़ डाला गया और कई में आग लगा दी गई।
इस्लामिक कट्टरपंथियों ने ना केवल मंदिरों को अपमानित किया बल्कि वहां स्थापित हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियों के सर कलम करने जैसे घृणित कृत्यों को भी अंजाम दिया।
जाहिर है इस तरह के कृत्यों के पीछे हिंदुओं की पूजा पद्धति से पूर्वाग्रह और कट्टर इस्लामी मानसिकता काम कर रही थी।
इन कट्टरपंथियों की हिंदुओं से घृणा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हिंदू मंदिरों को अपवित्र करने और आग लगाने के बाद भी ये लोग रुके नहीं और हिंदू बस्तियों में उनके घरों में लूटपाट और आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया। इस दौरान हिंदू महिलाओं से बलात्कार और पुरुषों की क्रूर लिंचिंग की गई।
आंकड़े बताते हैं कि बांग्लादेश दुर्गापूजा हिंसा के दौरान कम से कम 1650 घर जला दिए गए, 350 मंदिरों में तोड़फोड़ की गई, 14 से अधिक हिंदुओं को क्रूरता की उच्चतम सीमा तक जाकर मार डाला गया और कम से कम 26 हिंदू महिलाओं व बच्चियों से बलात्कार किया गया।
इनके अलावा 17 हिंदू लापता हो गए, जबकि सैकड़ों की संख्या में घायल हुए। वहीं पूरे बांग्लादेश में हिंदुओं के व्यवसायों और दुकानों में आगजनी और तोड़फोड़ की गई।
बांग्लादेश सरकार और पुलिस का गैरजिम्मेदाराना रवैया
वर्तमान में पूरे बांग्लादेश में हिंदू आतंकित हैं और अपने भविष्य को लेकर अनिश्चित हैं। बांग्लादेश की सरकार और पुलिस अल्पसंख्यक हिंदुओं को एक भयमुक्त रहन सहन उपलब्ध करवाने में नाकाम रही है। इसका उदाहरण दुर्गापूजा की हिंसा में भी देखने को मिला जब वहां की सरकार ने हिंसा की घटनाओं के बाद गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाए रखा। प्रधानमंत्री शेख हसीना द्वारा भी ऐसे बयान दिए गए जिसे उपद्रवियों ने अपने समर्थन के रूप में लिया और हिंसा करते रहे।
बांग्लादेश की तत्कालीन शेख हसीना सरकार ने हालांकि इस मामले में सख्त कार्रवाई करने का आश्वासन दिया था, लेकिन इस तरह की कोई कार्रवाई कभी नहीं की गई। वैसे भी इस्लामिक देशों में सरकार का कट्टरपंथियों के सामने झुकने का इतिहास रहा है।
हिंसा की घटनाओं के सामने आने पर भारत द्वारा इसे लेकर चिंता जताई गई तो उसका जवाब देते हुए शेख हसीना ने भारत को चेताया कि भारत में भी ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए जिसका असर बांग्लादेश और वहां के अल्पसंख्यक हिंदुओं पर पड़े।
शेख हसीना के इस बयान को वहां के कट्टरपंथियों ने अपने समर्थन के रूप में लिया जिसके बाद हबीबगंज जैसे अन्य क्षेत्रों में भी हिंसा की घटनाएं सामने आई।
हबीबगंज के एक दुर्गा पांडाल पर मदरसे के छात्रों ने हमला कर दिया जिसमें 20 से ज्यादा लोग घायल हो गए।
वहीं पूरी घटना के दौरान बांग्लादेश की पुलिस का भी गैरजिम्मेदाराना रवैया देखने को मिला। हिंसा की लगभग सभी घटनाओं के दौरान पुलिस के पास स्थिति को नियंत्रण में करने का मौका था, लेकिन शायद वे इस हिंसा को नियंत्रित करना ही नहीं चाहते थे।
मीडिया की सेंसरशिप
2021 के दुर्गापूजा नरसंहार का सबसे दुखद पहलू ये है कि इस घटना के संबंध में सूचनाओं को बड़े पैमाने पर सेंसर किया गया। बांग्लादेश के दो प्रमुख ट्विटर हैंडल्स @ISKCONBDH और @unitycouncilBD को ट्विटर से हटा दिया गया। इनमें से पहला ट्विटर हैंडल जिस मंदिर का है उसमें भी आगजनी की घटना को अंजाम दिया गया।
ये दोनो ट्विटर हैंडल्स घटना से संबंधित सूचनाएं जारी कर रहे थे। इसके अलावा @StoriesofBHs नाम के एक ट्विटर हैंडल को भी सस्पेंड कर दिया गया। यह ट्विटर हैंडल भारत और बांग्लादेश में बंगाली हिंदुओं की संस्कृति से संबंधित और उनके उत्पीड़न पर सूचनाएं उपलब्ध करवाता था।
इन ट्विटर हैंडल्स को हटाया जाना सबसे ज्यादा चौंकाने वाला कदम था। क्योंकि इन्हें सूचना प्रसारण से एक ऐसे समय में रोका गया जब वहां उनकी उपस्थिति सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थी।
दूसरी ओर बांग्लादेश के मुख्यधारा के मीडिया में भी इस हिंसा। के प्रति उदासीनता दिखाई दी। बांग्लादेश की मीडिया ने जिस तरह से इस घटना की रिपोर्टिंग की, ऐसा लगता है कि बांग्लादेश मीडिया के अनुसार इस तरह की कोई घटना कभी हुई ही नहीं।
बांग्लादेश के एक वरिष्ठ पत्रकार ने इस बारे में टिप्पणी की कि,
“बांग्लादेश मीडिया में खबरों को सेंसर करने की आदत हो गई है। कुछ ने हिंदू विरोधी हिंसा को इतने डरपोक तरीके से कवर किया कि ऐसा लगा जैसे कुछ हुआ ही नहीं”।
