देश की आजादी के बाद हुए बंटवारे और उस दौरान हुए दंगों की अनेकों कहानियाँ आपने सुनी होंगी। उस दौरान हजारों लाखों की संख्या में हिंदुओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था तो हिन्दू महिलाओं को वीभत्स बलात्कार का सामना करना पड़ा। ये सब हो रहा था मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना के अलग राष्ट्र के पागलपन के कारण।
हालांकि आज हम आपको आजादी के बाद की नहीं बल्कि आजादी से ठीक एक साल पहले की कहानी के बारे में बताने जा रहे हैं, जब अपने पाकिस्तान के सपने को पूरा ना होते देखकर बौखलाहट में मोहम्मद अली जिन्ना और उसके सिपहसालारों ने बंगाल में हिंदुओं के खून की होली खेली।
हम बात कर रहे हैं, आजादी से एक साल पहले 1946 में कोलकाता और बंगाल के अन्य इलाकों में डायरेक्ट एक्शन डे के दौरान अंजाम दिए गए हिंदुओं के नरसंहार के बारे में। तब जिन्ना के पाकिस्तान के सपने में हजारों हिंदुओं को कुछ घंटों में काट डाला गया था।
इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा अंजाम दिया गया यह हिन्दू नरसंहार इतना क्रूर था कि आज तक पता नहीं चल पाया है कि उस दौरान वास्तव में कितने हिन्दू मारे गए थे। इस घटना की वीभत्सता को देखते हुए इसे ‘द ग्रेट कलकत्ता किलिंग’ भी कहा जाता है।
‘डायरेक्ट एक्शन डे’ हिन्दू नरसंहार की पृष्ठभूमि
दरअसल डायरेक्ट एक्शन डे हिन्दू नरसंहार की पृष्ठभूमि में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का पाकिस्तान को लेकर उतावलापन था, जो 1946 आते आते पागलपन की हद तक पहुँच चुका था। जैसे जैसे भारत की आजादी का समय नजदीक आता जा रहा था, जिन्ना का पाकिस्तान बना पाने का सपना भी टूटता नजर आ रहा था। तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने पाकिस्तान की मांग को सिरे से खारिज कर दिया था।
1946 में जब भारत का स्वतंत्रता संग्राम चरम पर पहुँच चुका था और अंग्रेजों को भी लगने लगा था कि अब वे बहुत ज्यादा समय तक भारत को अपने नियंत्रण में नहीं रख पाएंगे। ऐसे में अंग्रेजों ने भारत में सत्ता हस्तांतरण की तैयारियां शुरू कर दी। इसके लिए ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लिमेंट एटली ने एक 3 सदस्यीय दल, जिसे केबिनेट मिशन कहा गया, भारत भेजा। केबिनेट मिशन का उद्देश्य था भारत में सत्ता हस्तांतरण की अंतिम योजना को आकार देना।
इस उद्देश्य के लिए केबिनेट मिशन ने तत्कालीन भारत की दो बड़ी पार्टियों कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं की एक बैठक बुलाई जिसमें भारत की आजादी के संबंध में चर्चा की गई। बैठक में तय किया गया कि एक भारतीय गणराज्य की स्थापना की जाएगी और उसके बाद सत्ता का हस्तांतरण किया जाएगा।
इस बैठक के बाद से ही मोहम्मद अली जिन्ना ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया और उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी भाग में एक स्वायत्त मुस्लिम राष्ट्र की मांग कर दी। जाहिर है तत्कालीन कांग्रेस के नेताओं, जिनमें सरदार वल्लभ भाई पटेल भी शामिल थे, ने जिन्ना की इस मांग को ठुकरा दिया।
अपनी मांग ठुकराए जाने की बौखलाहट में जिन्ना ने संविधान सभा का बहिष्कार कर दिया और मुस्लिमों को भड़काने में लग गए। इसके लिए उसने अपने मुंबई स्थित आवास पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और डायरेक्ट एक्शन की घोषणा कर दी।
जिन्ना ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि मुस्लिम लीग एक अलग इस्लामिक मुल्क ‘पाकिस्तान’ के लिए संघर्ष की तैयारी कर रहा है। अगर मुस्लिमों को उनके मनमुताबिक पाकिस्तान नहीं मिल तो वे डायरेक्ट एक्शन को अंजाम देंगे। जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन के लिए 16 अगस्त का दिन मुकर्रर कर दिया।
16 अगस्त का डायरेक्ट एक्शन और कोलकाता में हजारों हिंदुओं को काट डाला गया
शुरुआत में किसी को भी ये नहीं पता था कि जिन्ना का डायरेक्ट एक्शन आखिर है क्या? लेकिन 16 अगस्त 1946 आते आते तस्वीर साफ होने लगी थी। जिन्ना ने पूरे देश में डायरेक्ट एक्शन की धमकी दी थी, लेकिन मुस्लिम बहुल बंगाल जहां मुस्लिम लीग की सरकार थी वहाँ जिन्ना के राक्षसी मंसूबे डायरेक्ट एक्शन की सबसे साफ तस्वीर सामने आई। बंगाल के कोलकाता और अन्य इलाकों में हिंदुओं की हत्याओं का सिलसिला शुरू हो गया। हजारों महिलाओं का बलात्कार और जबरन धर्मांतरण किया गया।
हिंदुओं के साथ अंजाम दिए गए इस नरसंहार में बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी का बहुत बड़ा योगदान था। तब नमाज के लिए इकट्ठा हुई मुस्लिम भीड़ को सुहरावर्दी और अन्य मुस्लिम नेताओं में अपने भाषणों से खूब भड़काया। इन भाषणों के बाद मुस्लिमों की इस भीड़ ने हिंदुओं का कत्लेआम करना शुरू कर दिया।
दरअसल जिन्ना के पाकिस्तान से अलग सुहरावर्दी की एक अलग योजना थी। उसने पूर्व में एक अलग देश की कल्पना की थी, जिसमें पूरा बंगाल, असम और बिहार के कुछ जिले शामिल होते। इस देश को ग्रेटर इंडिपेंडेंट बंगाल कहा जाना था। हालांकि यह योजना सफल नहीं हो पाई।
डायरेक्ट एक्शन से जुड़ी रिपोर्ट्स के मुताबिक उस दिन नमाज के लिए इकट्ठा हुए मुस्लिमों की संख्या लाखों में थी। अधिकांश रिपोर्ट्स में ये आंकड़ा 5 लाख के आस पास बताया जाता है। ये मुस्लिम ट्रकों में भर भरकर कोलकाता और आसपास के इलाकों में लाए गए थे और इनके पास भारी मात्रा में हथियार भी थे।
नमाज के बाद स्थानीय कट्टरपंथी मुस्लिम नेता ख्वाजा नजीमउद्दीन के भाषण के बाद यह भीड़ हिंसक हो गई और हिंदुओं को निशाना बनाने लगी। राजा बाजार, केला बागान, कॉलेज स्ट्रीट, हैरिसन रोड और बर्रा बाजार जैसे इलाकों में हिंदुओं पर हमले शुरू हो गए। इस दौरान हिंदुओं के घरों और दुकानों को जला दिया गया और उनकी संपत्ति को लूट लिया गया।
शाम होते होते इन सभी इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया और सेना की तैनाती कर दी गई। इससे लगा कि हालत सामान्य हो जाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अगले दिन 17 अगस्त को मुस्लिम भीड़ ने और अधिक तीव्रता से हमला किया। 17 अगस्त को मुस्लिम दंगाइयों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी।
हिंदुओं को चुन चुन कर मारा जाने लगा। हजारों हिंदुओं को धारदार हथियारों से काट डाला गया। हिन्दू महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार अंजाम दिया गया और उनका जबरन धर्मांतरण किया गया। शर्मनाक बात ये है कि इनमें से अधिकांश हिन्दू महिलाओं का उनके परिवार वालों के सामने ही बलात्कार किया गया। हिंदुओं को अपमानित करने के लिए उनसे जबरन गौहत्या करवाई गई और उन्हें गौमांस खाने पर मजबूर किया गया।
72 घंटों में काट डाले गए छः हजार से ज्यादा हिन्दू
जिन्ना के पागलपन और इस्लामिक कट्टरपंथ का ये नंगा नाच 20 अगस्त तक चलता रहा। हिंसा की छिटपुट घटनाएं तो हफ्तों तक चली रही। इस दौरान कोलकाता में ही करीब छः हजार हिंदुओं का नरसंहार किया गया। अनगिनत महिलाओं के साथ बलात्कार और जबरन धर्मांतरण किया गया। जबकि 20,000 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए तो लाखों लोगों को अपना घरबार छोड़कर दूसरे इलाकों में पलायन करना पड़ा।
इन लाखों लोगों में से अधिकांश कभी वापस कोलकाता नहीं लौट पाए, जिसके कारण बहुत से इलाकों में जनसंख्या परिवर्तन देखा गया। अनेक हिन्दू बहुल इलाके अब मुस्लिम बहुल हो चुके थे, जिसके दुष्परिणाम हिन्दू आज तक भुगत रहे हैं।
मौतों का सहीं आंकड़ा क्या था, कह पाना मुश्किल है
जिस वीभत्सता से इन दंगों को अंजाम दिया गया और अनेकों प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के मुताबिक यह मानना मुश्किल है कि इस नरसंहार में मरने वाले हिंदुओं की संख्या इतनी कम रही होगी। मौतों का सही आंकड़ा क्या है यह कह पाना मुश्किल है। जुगल चंद्र घोष नाम के एक प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक उसने 4 ट्रक देखे थे जिसमें 3 फुट की ऊंचाई तक लाशें भारी हुई थी। इसके अलावा बड़ी संख्या में हिंदुओं की लाशों को हुगली नदी में फेंक दिया गया था।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर नजर रखने वाले मशहूर अमेरिकी पत्रकार की रिपोर्ट के मुताबिक,
“प्रांतीय सरकार ने मरने वालों का आँकड़ा 750 बताया जबकि सैन्य आँकड़ा 7,000 से 10,000 मौतों का है। 3,500 लाशों को तो इकट्ठा किया जा चुका है लेकिन कोई नहीं जानता कि हुगली में कितने लोगों को फेंका गया, कितने लोग शहर के बंद पड़े नालों में घुट कर मर गए। 1200 के लगभग हुई भीषण आगजनी की घटनाओं में कितने लोग जला दिए गए और कितने लोगों का उनके रिश्तेदारों ने चुपचाप अंतिम संस्कार कर दिया। एक सामान्य अंदाजा लगाया जाए तो मरने वालों की संख्या 4000 से अधिक और घायल होने वाले लोग लगभग 11000 थे।”
तथागत रॉय अपनी किताब ‘My People, Uprooted: A Saga of the Hindus of Eastern Bengal’ में लिखते हैं मुस्लिमों ने एक प्लान के तहत हिन्दू विरोधी दंगों की तैयारियाँ की और अंततः 16 अगस्त 1946 को उन तैयारियों को नरसंहार के रूप में अंजाम दिया।
कलकत्ता के मेयर और कलकत्ता मुस्लिम लीग के सचिव एसएन उस्मान ने बांग्ला भाषा में लिखे हुए पम्पलेट बाँटे थे जिनमें लिखा हुआ था,
“काफेर! तोदेर धोंगशेर आर देरी नेई। सार्बिक होत्याकांडो घोतबे”, जिसका मतलब था, “काफिरों! तुम्हारा अंत अब ज्यादा दूर नहीं है। अब हत्याकांड होगा।”
