चंबा नरसंहार: जब क्षेत्र के विकास से चिढ़कर आतंकियों ने 35 हिंदू मजदूरों को मार डाला

चंबा नरसंहार: जब क्षेत्र के विकास से चिढ़कर आतंकियों ने 35 हिंदू मजदूरों को मार डाला

कभी दक्षिण एशिया से मध्य एशिया तक प्रभुत्व में रहे हिंदू आज सिकुड़कर सिर्फ भारत में महदूद रह गए हैं। सैकड़ों वर्षों से इस्लामी आतंक को झेल रहा हिंदू समुदाय आज अफगानिस्तान, पाकिस्तान और मध्य एशिया के अनेकों क्षेत्र गंवा चुका है। आज इन देशों में हिंदुओं की संख्या नाममात्र की रह गई है, जबकि कभी ये क्षेत्र हिंदू बहुसंख्यक हुआ करते थे।

स्थिति ये हो गई है कि भारत में भी हिंदू समुदाय सुरक्षित नहीं है। भारत के बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां लगातार हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं। हिंदू फाइल्स में हम ऐसी ही घटनाओं का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं। इनमें से अनेकों घटनाएं ऐसी हैं जिनके बारे में लोगों को कोई जानकारी ही नहीं है।

इसी कड़ी में आज हम 1998 में हुए चंबा नरसंहार की बात करेंगे। यह नरसंहार पाकिस्तान पोषित इस्लामी आतंकियों द्वारा क्षेत्र के हो रहे विकास से चिढ़कर किया गया था जिसमें 35 से ज्यादा हिंदू मजदूरों को गोलियों से भून दिया गया।

चंबा जिले की भौगोलिक स्थिति

इस नरसंहार के बारे में जानने से पहले चंबा जिले की भौगोलिक स्थिति के बारे में जानना आवश्यक है। चंबा, हिमाचल प्रदेश का जम्मू कश्मीर से सटा हुआ जिला है। इसकी सीमा जम्मू कश्मीर के डोडा जिले से लगती है। इस जिले के कुछ हिस्सों से पंजाब और जम्मू कश्मीर तक पैदल ही जाया जा सकता है।

यह घटना तब की है जब जम्मू कश्मीर में आतंकियों के मंसूबे चरम पर हुआ करते थे। हालांकि हिमाचल प्रदेश आतंक की चपेट में नहीं आया था। यहां पहले कोई आतंकी घटना दर्ज नहीं की गई थी।

लेकिन अगस्त 1998 के पहले हफ्ते में ही सब कुछ बदल गया और आतंकियों ने चंबा जिले की दो अलग अलग जगहों पर हिंदुओं को निशाना बनाकर हमला किया। इन हमलों में कुल 35 लोग मारे गए जो कि सभी हिंदू मजदूर थे। इसके अलावा कुछ लोगों को आतंकी बंधक बनाकर भी ले गए जिनके बारे में आज तक कुछ पता नहीं चल पाया है।

चंबा के कलावन इलाके में हुआ पहला हमला

हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में ऐतिहासिक मिंजर और मणिमहेश मेला लगता आ रहा है। मिंजर एक प्रदेश स्तरीय मेला है जबकि मणिमहेश का प्रभाव पूरे देश में है। इन मेलों के दौरान पूरे देश से श्रद्धालु चंबा पहुंचते हैं।

कलावन में हुई आतंकी घटना के समय मिंजर मेला लगा हुआ था और मणिमहेश मेलों की तैयारी चल रही थी।

3 अगस्त 1998 को स्वचालित हथियारों से लैस आतंकी जम्मू कश्मीर के डोडा जिले से कलावन में घुसते हैं। वहां आतंकियों ने जैसे ही हिंदू मजदूरों को देखा तो फायरिंग शुरू कर दी।

इस घटना में कुल 26 लोग मारे गए जबकि 8 घायल हुए थे। स्थानीय लोगों ने तब इसे खूनी मिंजर का नाम दिया था। इस घटना के बारे में कुछ लोगों ने ये भी दावा किया था कि आतंकियों ने हिंदुओं को पेड़ों से बांधकर एक एक करके गोली मारी थी।

यह हरकत इन आतंकियों की हिंदुओं के प्रति घृणा को प्रदर्शित करता है।

विडंबना ये है कि इतनी बड़ी घटना के बाद भी प्रशासन को इसके बारे में कुछ पता नहीं चल पाया। प्रशासन को जानकारी तब हुई जब दो घायल किसी तरह 8 किलोमीटर चलकर नजदीकी मनसा थाने पहुंचे और घटना की जानकारी दी।

सतरुंडी में हुआ दूसरा हमला

हिमाचल प्रदेश के एक मात्र आतंकी हमले में गिना जाने वाला चंबा नरसंहार का दूसरा हमला सतरुंडी इलाके में हुआ। यहां आतंकियों ने कुल 6 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया, जबकि 3 बुरी तरह घायल हुए थे।

यह घटना रात के डेढ़ बजे अंजाम दी गई थी। दूसरे दिन जब हिमाचल के लोग उठे तो उनकी सुबह की शुरुआत इस खूनी घटना के साथ हुई।

क्षेत्र के हो रहे विकास से चिढ़े हुए थे आतंकी

इस घटना का प्रारंभिक कारण क्षेत्र का हो रहा विकास था। ये हिंदू मजदूर लगातार क्षेत्र के विकास में अपना योगदान दे रहे थे और विभिन्न निर्माण स्थलों पर मजदूरी कर के अपना व अपने परिवार का पेट पाल रहे थे।

आतंकी नहीं चाहते थे कि क्षेत्र का विकास हो। इसलिए उन्होंने वहां मजदूरों में डर बैठाने के उद्देश्य से इस नरसंहार को अंजाम दिया। आतंकी निर्माणाधीन बैरागढ़-सतरुंडी रोड से बेहद खफा थे।

आतंकियों को डर था कि इस रोड के निर्माण से वहां आवाजाही बढ़ जायेगी, जिससे इस क्षेत्र में उनकी गतिविधियां प्रभावित होंगी। दरअसल पंजाब और जम्मू कश्मीर में प्रशासन के दबाव के चलते ये आतंकी इस बर्फ पिघलने पर इस क्षेत्र को अपना ठिकाना बना लेते थे।

चंबा के इस इलाके के लोग बर्फ पिघलने पर ऊंचाई वाले इलाकों को छोड़कर नीचे काम धंधे की तलाश में चले जाते थे। तब आतंकी इनके घरों को अपना ठिकाना बना लेते थे ताकि सुरक्षा बलों की कार्रवाई से बचा जा सके। आतंकी इन घरों का ‘हाइडआउट्स’ की तरह प्रयोग करते थे।

वहीं स्थानीय मुस्लिम गुर्जर समुदाय के लोग इस क्षेत्र में उनकी मदद किया करते थे। इस घटना के बाद से ही मुस्लिम गुर्जर और हिन्दू गद्दी समुदाय के लोगों में तनाव का माहौल बन गया था।

इसके बाद दबाव में सरकार ने गुर्जरों को मैदानी इलाकों में स्थानांतरित किया था ताकि दोनो समुदायों के बीच शांति बनी रहे।