जम्मू कश्मीर के हिंदू सैकड़ों सालों से इस्लामिक आतंकवाद का सामना कर रहे हैं। कश्मीर में हिंदुओं ने ना केवल पलायन का दंश झेला बल्कि वो जो अपनी जमीन छोड़कर नहीं गए उन्हें बड़ी बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया। जम्मू कश्मीर के इतिहास में ऐसी अनेकों घटनाएं हैं जब हिंदुओं को सिर्फ इसलिए मार डाला गया क्योंकि वो हिंदू थे।
ऐसी ही एक घटना साल 2006 में कश्मीर के डोडा जिले में सामने आई जब सेना की वर्दी में आए आतंकियों ने 22 हिंदुओं को गोली मार दी। इन हिंदुओं को लाइन में खड़ा करके एक एक की पहचान पूछकर गोली मारी गई थी। आतंकियों की क्रूरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 3 साल की बच्ची तक को नहीं छोड़ा।
2006 का डोडा हिंदू नरसंहार
यह घटना 30 अप्रैल 2006 की है जब केंद्र में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार हुआ करती थी। तत्कालीन सरकार का आतंकियों के प्रति नरम रवैया हुआ करता था और प्रधामंत्री मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री निवास में यासीन मलिक जैसे घोषित आतंकी से मुलाकात करते हुए दिख जाते थे।
जाहिर है आतंकियों के हौसले बुलंद थे। यही कारण था कि इन आतंकियों ने कश्मीर के डोडा में इस नरसंहार को अंजाम देने की हिम्मत की।
आतंकियों ने डोडा जिले के थावा गांव में निहत्थे हिंदुओं पर हमला कर दिया। पाकिस्तान समर्थित ये आतंकी 10-12 की संख्या में सेना की वर्दी पहनकर आए थे।
रात के करीब दो बजे इन आतंकियों ने ग्रामीणों के घर के दरवाजे खटखटाना शुरू कर दिए। सारे गांव वालो से उनकी पहचान पूछकर उनमें से हिंदुओं को अलग किया गया और उन्हें एक लाइन में खड़ा कर दिया गया।
इसके बाद इन दुर्दांत आतंकियों ने लाइन में खड़े किए गए 22 हिंदुओं को एक एक कर के गोली मार दी। मरने वालों में एक 3 साल की मासूम बच्ची भी शामिल थी।

इस घटना के बाद हिंदू ग्रामीण पास के ही एक सेना कैंप में मदद मांगने के लिए गए थे। हालांकि जब तक सेना आई तब तक आतंकी भाग चुके थे।
दूसरी ओर बसंतगढ़ क्षेत्र के लालो गांव में भी आतंकियों ने मौत का नंगा नाच दिखाया। वहां इन आतंकियों ने 13 हिंदू चरवाहों का अपहरण करके उन्हें गोली मार दी।
इस तरह उस दिन कुल 35 हिंदुओं का नरसंहार इन इस्लामिक आतंकियों द्वारा किया गया था।
इन दोनो नरसंहारों के लिए पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा जिम्मेदार था जो उस समय भारत सरकार और हुर्रियत कांफ्रेंस के मध्य प्रस्तावित वार्ता से चिढ़ा हुआ था। हुर्रियत कांफ्रेंस ने तब जम्मू कश्मीर में चुनाव का बहिष्कार किया था। इसी संबंध में भारत सरकार हुर्रियत के नेताओं से बातचीत करने वाली थी, ताकि चुनाव के द्वारा घाटी में स्थायित्व आ सके और घाटी में शांति का मार्ग प्रशस्त हो सके।
